प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज जम्मू- कश्मीर के शिखर नेताओं से राज्य के भविष्य को लेकर बात करने वाले हैं । इसलिए इंडिया गेट से कुछ आगे पृथ्वीराज रोड पर स्थित जम्मू-कश्मीर हाउस में गुजरे कुछ दिनों से हलचल बढ़ी हुई है। कारें अंदर-बाहर जाती हुई दिखाई देती हैं। आज यहां पर राज्य के कुछ नेता ठहरेंगे भी।
जम्मू-कश्मीर हाउस सन 1948 में स्थापित हुआ था। यहां पहले भावनगर हाउस था। जम्मू-कश्मीर सरकार ने इसे भावनगर के राज परिवार से खरीदा था। इधर से कश्मीर घाटी में जाने वाले पर्यटकों और बाकी लोगों को परमिट जारी किए जाते थे।
इधर मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला की पहल पर सन 1950 के आसपास जम्मू-कश्मीर एम्पोरियम भी शुरू कर दिया गया था ताकि राज्य के हथकऱघा उद्योग में बनने वाले सामान से देश को परिचित करवाया जा सके।
लेकिन राजधानी में पहला कश्मीर हाउस तो सन 1929 तक बन गया था। उसमें महाराजा हरिसिंह अपने दिल्ली प्रवास के समय ठहरा करते थे। यह राजाजी मार्ग पर है। दरअसल देश की राजधानी सन 1911 में दिल्ली में शिफ्ट हुई तो अनेक रियासतों ने वायसराय से आग्रह किया कि उन्हें दिल्ली में अपना ‘हाउस’ का निर्माण करने के लिए जमीन आवंटित की जाए। गोरी सरकार ने इस आग्रह को मानते हुए 29 रियासतों को राजधानी के खासमखास क्षेत्रों में भूमि आवंटित की।
बहरहाल सरकार ने देश की आजादी के तुरंत बाद कश्मीर हाउस को भारतीय सेना को सौंप दिया। यह वास्तव में भव्य है। यह कम से कम ढाई-तीन एकड़ क्षेत्र में होगा ही।
और चाणक्यपुरी में जम्मू-कश्मीर हाउस साठ के दशक के मध्य में बना। यहां पर पहले राज्य के राज्यपाल और अब उप राज्यपाल ठहरते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री शुरू से ही पृथ्वीराज रोड के जम्मू-कश्मीर हाउस में ठहरते हैं।
इस बीच, जम्मू-कश्मीर हाउस में भी दो फाड़ हो गया है। इसके कौटिल्य मार्ग की तरफ खुलने वाले हिस्से को लद्दाख को दे दिया है। आप जानते हैं कि सरकार ने लद्दाख को राज्य से अलग करके केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया था।
राजधानी में कम से दो और इस तरह की संपत्तियां हैं जिनसे जम्मू- कश्मीर का कम से कम भावनात्मक संबंध रहा है। एक है 4-ए कोटला रोड का बंगला। यह बाल भवन के पास है। शेख अब्दुल्ला इधर सन 1964 से सन 1968 तक राजनीतिक बन्दी के रूप में रहे। उस दौरान कोटला रोड और कोटला लेन में सरकारी बंगले हुआ करते थे।
कहते हैं कि सरकार ने उन्हें रिहा करने के बाद कोटला लेन के बंगले को शेख अब्दुल्ला को आवंटित करना चाहती थी। अब्दुल्ला परिवार के मित्र और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री आई.के.गुजराल चाहते थे कि 4-ए कोटला लेन के बंगले को शेख अब्दुल्ला स्मारक के रूप में विकसित कर दिया जाए। पर यह हो ना सका।
महाराजा हरिसिंह के पुत्र डॉ करण सिंह के न्याय मार्ग के खूबसूरत बंगले को देखकर भी कश्मीरी भावुक हो जाते हैं। यह चाणक्य सिनेमा के बेहद करीब है। यह उनकी निजी संपत्ति है। डॉ करण सिंह यहां पर शाम को अपने मित्रों के साथ गप-शप करते हैं। यहां पर जयपाल रेड्डी नियमित रूप से आया करते थे।
वैसे दिल्ली में कश्मीरियों के आने और बसने का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है। दिल्ली में कश्मीरी परिवार 19 वीं सदी के मध्य से आकर बसने लगे थे। ये तब सीताराम बाजार में रहने लगे।
ये जिधर रहते थे उस जगह को कहा जाने लगा गली कश्मीरियान। इनके सरनेम रेहु, जुत्शी, हक्सर, कुंजरू, कौल,टिक्कू,जुत्शी वगैरह थे। ये सब पंडित नेहरु से अपने को जोड़कर देखते थे। ये स्वाभाविक ही था। आखिर नेहरु जी की पत्नी कमला नेहरु भी दिल्ली के कश्मीरी बिरादरी की लड़की थीं। इस बीच, कश्मीर में अस्थिरता के बाद भी हजारों कश्मीरी पंडित और कुछ मुसलमान भी दिल्ली आकर बसे। पहले वाले और अब आए कश्मीरियों में सरनेम को छोड़कर लगभग कोई समानता नहीं है। हालांकि इन्हें कश्मीर शब्द एक-दूसरे से जोड़ता है।
इस बीच, अब सीताराम बाजार की गली कश्मीरियान से लगभग सभी पुराने कश्मीरी परिवार राजधानी और एन.सी.आऱ के अन्य भागों में जा चुके हैं। इनमें बहुत से साउथ दिल्ली के पंपपोश एनक्लेव में भी रहते हैं।
Navbharatimes (Saddi Dilli) 23 June 2021
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