बम्बई की सुखद अनुभूतियों के साथ हैदराबाद में हफ्ते भर का प्रवास। मौसम लाजवाब है। दसहरा आसपास ही है। जाते ही हमारे लिए लालबहादुर शास्त्री क्रिकेट स्टेडियम में यादगार जश्न रखा गया।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के के के शास्त्री , ओमप्रकाश निर्मल और शर्मा जी के दो चार साथियों के साथ सांगत बैठी। सत्यनारायण शर्मा जी का कलरफुल टेब्लॉयड 'द एविडेंस वीकली 'प्रकाशित हो रहा था।
...मेरे लिए ये यादगार शाम थी। के के शास्त्री जी उन दिनों बड़ा नाम था। टाइम्स के एडीटर गिरिलाल जैन इनका बड़ा सम्मान करते थे और इनकी कॉपी को हाथ लगाने से डरते थे। ...ओमप्रकाश निर्मल प्रख्यात कवि हैं , आप साहित्य की पत्रिका 'कल्पना 'से भी समंद्ध रहे। ...जब डॉ राम मनोहर लोहिया ने रामायण मेला के आयोजन की ठानी तो चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन से रामकथा पर चित्र बनाने को कहा , तब हैदराबाद के बद्रीविशाल पित्ती के यहां ओमप्रकाश निर्मल हुसैन को रामकथा पढ़ कर सुनाते , व्याख्या करते तब हुसैन चित्रांकन करते। यह चित्र मैंने धर्मयुग के 1969 के दीपावली अंक मैं प्रकाशित देखें हैं।
...इस दौरान अपने हैदराबाद प्रवास में के के शास्त्री और ओमप्रकाश निर्मल का सान्निध्य मेरे लिए बड़ा ज्ञानवर्धक रहा। ...शरद जोशी के परम मित्र ओमप्रकाश निर्मल ने मुझे जोशी जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं से वाकिफ कराया और बताया की शरद जोशी हैं क्या। बताया कि जोशी जी बौद्धिक जटिलताओं से परे और छलछंद से मुक्त व्यक्तित्व हैं। उनसे व्यवहार में आप कोई पर्दा मत रखना। वे बहुत सहज और किसी भी सीमा तक जा कर सहयोग करने वाले हैं।
लाल बहादुर क्रिकेट स्टेडियम का पहले फतेह मैदान नाम था। बाद में 1967 में इसका नामकरण भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नाम पर किया गया।
लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम पर केवल तीन टेस्ट मैच खेले गए, ये सभी भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेले गए मैच हैं। इस मैदान पर पॉली उमरीगर का दोहरा शतक और सुभाष गुप्ते का न्यूजीलैंड के खिलाफ पारी में सात विकेट लेना, यादगार पलों से हैं।
निजामी ठाठ-बाट के इस शहर का मुख्य आकर्षण चारमीनार, हुसैन सागर झील, बिड़ला मंदिर, सालार जंग संग्रहालय है, जो इस शहर को एक अलग पहचान देते हैं। किसी समय नवाबी परम्परा के इस शहर में शाही हवेलियां और निज़ामों की संस्कृति के बीच हीरे जवाहरात का रंग उभर कर सामने आया तो कभी स्वादिष्ट नवाबी भोजन का स्वाद।
इस शहर के ऐतिहासिक गोलकुंडा दुर्ग की प्रसिद्धि दूर दूर तक पहुंची और इसे उत्तर भारत और दक्षिणांचल के बीच संवाद का अवसर सालाजार संग्रहालय तथा चारमीनार ने प्रदान किया है। गोलकुंडा दक्षिणी हैदराबाद से पाँच मील पश्चिम स्थित एक दुर्ग तथा ध्वस्त नगर है। यहां इतिहास आप से संवाद करता है ।
पूर्वकाल में यह कुतबशाही राज्य में मिलनेवाले हीरे-जवाहरातों के लिये प्रसिद्ध था। इस दुर्ग का निर्माण वारंगल के राजा ने 14वीं शताब्दी में कराया था। बाद में यह बहमनी राजाओं के हाथ में चला गया और मुहम्मदनगर कहलाने लगा। 1512 ई. में यह कुतबशाही राजाओं के अधिकार में आया और वर्तमान हैदराबाद के शिलान्यास के समय तक उनकी राजधानी रहा।
फिर 1687 ई. में इसे औरंगजेब ने जीत लिया। यह ग्रैनाइट की एक पहाड़ी पर बना है जिसमें कुल आठ दरवाजे हैं और पत्थर की तीन मील लंबी मजबूत दीवार से घिरा है। यहाँ के महलों तथा मस्जिदों के खंडहर अपने प्राचीन गौरव गरिमा की कहानी सुनाते हैं।
मूसी नदी दुर्ग के दक्षिण में बहती है। दुर्ग से लगभग आधा मील उत्तर कुतबशाही राजाओं के ग्रैनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी फूटी अवस्था में अब भी विद्यमान हैं।
शहर में स्थित तेलुगु फिल्म उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा चलचित्र चलचित्र निर्माता है। कहा जाता है कि किसी समय में इस ख़ूबसूरत शहर को क़ुतुबशाही परम्परा के पांचवें शासक मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह ने अपनी प्रेमिका भागमती को उपहार स्वरूप भेंट किया था।
हैदराबाद को 'निज़ाम का शहर'तथा 'मोतियों का शहर'भी कहा जाता है।...सालार जंग संग्रहालय अब तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद शहर में मूसा नदी के दक्षिणी तट पर दार-उल-शिफा में स्थित एक कला संग्रहालय है। यह भारत के तीन राष्ट्रीय संग्रहालयों में से एक है। यह हैदराबाद शहर के पुराने शहर जैसे चारमीनार, मक्का मस्जिद आदि महत्वपूर्ण स्मारकों के करीब है।
मीर यूसुफ अली खान, सालार जंग 3 (1889 -1949) एक महान व्यक्ति थे, जिन्होंने 7th निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान के शासन के दौरान हैदराबाद प्रांत के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया था।...हैदराबाद एक जिंदादिल शहर है ।
... निर्मल जी ने हमें खूब हैदराबाद घुमाया। निर्मल जी शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकर हैं ।
मंगलवार /26 - 10 -21 / 2 - 27 ए एम