सतीश गुजराल की औरतों के साथ !...सुंदर बाग़ - बागीचों में , जंगल - वादियों में इन दिनों प्रकृति के अंग-प्रत्यंग पर वसंत ब्रश फेर रहा है। पत्थर तराश रहा है , उसे मांसल बना रहा , पंख दे रहा है। ..लगता है प्रकृति की लीला को चुपके-चुपके सतीश गुजराल ने देख लिया है। आकार पाने को बैचैन ...बेडौल पत्थर ...यौवन की आग से तप रहे हैं। ..एक मद्धम आंच है। ..जब रु-ब-रु हैं आप कैनवास पर उतरी गुजराल की औरतों के ।
शिल्प और कैनवास जब आइने बन जायें एक दूसरे के लिए ...एक ही छत के नीचे तो दोनों के बीच खड़े आप अपनी मनःस्थति के कितने चित्र दिखा सकते हैं ...! कितने ही। ..,
परत-दर-परत ...
खुलती अनावृत औरत
जो कहीं अपनी ही
केशराशि के पर्दे में है
जो कहीं अपने
समग्र देह -दर्शन के साथ
अंग-अंग पखेरू है
जो कहीं , दग्ध है , बिद्ध है ,तप्त है
जो कहीं। ...नख-शिख संगीत है
रंग मैं डूबा राग है
जो कहीं , काम का प्रपात है
कहीं उन्मुक्त , कहीं व्यक्त , कहीं अव्यक्त ...
अपनी ही अनुगामिनी ...
बांचा ,अबांचा , महाकाव्य है !
यूँ तो पहाड़ से लुढ़के हर पत्थर में आग होती है ...और हर पत्थर पर रंग चढ़ते हैं ...तराश अपनी शायरी भी लिखती है ...पर ये कुदरत का करिश्मा ही तो है कि कुछ पत्थरों को तराश और रंगत ऐसी मिलती है कि वे कहीं पूजे जाते हैं। और कुछ पत्थर ऐसे जो संगतराश की गोद से गिरते हैं ,जो फूल -सा ...फूल से भी ज्यादा कोमल बन कर खिलते हैं...और इंसानियत को सरसब्ज करते हैं .
क्या बात हो जब कोई संगतराश पत्थर को औरत बना दे...और वो इतनी कोमल लगे कि आपका भी मन करे कि बाहों में भर लें ...लेकिन लगे कि कहीं कोई देख न ले ...लाज लगे। ...तो आंखों में भर लें ! ... कहीं - कहीं गुजराल भी लजाये हैं अपनी औरतों से। ...जब वे एक झटके से सामने आ गयीं हैं ...सब कुछ दरसाती ...तो थोड़ा लजाकर और थोड़ी हिम्मत कर कलाकार ने उनके ही बालों से उनके उभार को ढांप दिया है। ...पर जब वक्ष ...
पखेरू के प्राण और पंख पा जाएं तो ...तो वे बालों के झुरमुट से झांक उठे हैं...पंख फडफडाते हुए ... कहीं बृषभ अनुरक्त है...तो कहीं अश्व औरत के पाँव के अंगूठे से बंधा ... मुग्ध ...भांपिये ... शायद आप ही का विराट हो मुग्ध - भाव में।
पुरुष का सारा शौर्य अभिसार की बेला में शायद ऐसे ही व्यक्त होता है ...काम की ... प्रचंड आग की गोद में पुरूष का यूँ सुकूंनपरस्त अंदाज में दुबकना ...बखूबी व्यक्त है ।
औरत जो यहाँ पत्थरों में है .
...वो आबनूसी रंग में अपनी मांसलता से अभिभूत करती है ...और जो अपनी चमक और रंग के साथ आलोकित है ... वो बखूबी पढी जा रही है ...खुरदुरी है ...बावजूद अपने कच्चे माल के ..
औरत ...अपने पक्के अंदाज में है ! ...मन की उमंगों और अनुभूतियों की गहराइयों में डूबे मनोभावों के साथ भी ...वो डूबी-डूबी सी नहीं ...मछली - सी चमक - दमक भरी है ...साफ़ पानी में ...चमकीली ... मछली ..
पकडिये !
कनाट - प्लेस के ए - वन ब्लाक की , आर्ट - टुडे गैलरी की खिड़कियों से झांकती गुजराल साहब की औरतें ...हाथ पकड़ कर खींचतीं हैं ...
जिस शाम हम इस जोड़ - जुगत में थे कि सर्जक बताये अपनी इन ताजातरीन औरतों का जीवन - वृत्त । उस दिन 22 फरवरी 1995 की शाम तक सूरज देवता नदारत थे ... आसमान बादलों भरा ...सुबह ठंडी हवाएँ थीं ...और दोपहर से ही रिमझिम फुहारों का सिलसिला था ...औरतें आराम से थीं ।...अपनी दुनिया में छिटपुट दर्शकों को दिखती - छिपती ...झटके से देखो तो कैनवास पर औरतें ठिठक जातीं ...थोड़ा रुको तो लगता कि वे आश्वस्त हुईं ...और बतियाने लगतीं ...बाएँ से चलें तो पहले और दूसरे कोने तक की औरतें ...अपनी बात फुसफुसा कर कहतीं मिलीं ... तीसरे कोने पर फुसफुसाहट नहीं ...देह की टंकार है ...औरत - देह जितनी कसी जा सकती ...इतनी कि तार टूटे नहीं ...कसी गयी है ...उजास फूट रहा है पूरी देह से !...कोरी आंखों से देखें तो औरत की देह सफ़ेद है और खुरदुरी ... देह को कम ही रंग छुलाया है गुजराल ने , मनोभावों को रंग देने के लिए ज़रूर मुखाकृति को रंग - स्पर्श है ...
फ़िर भी ... पूरी देह जैसे ...दहक की लोहित - आभा से भरी अपने पुरूष को अपने में आबध्द किए , अपने में दुबकाए ...अपने विराट में एकाकार किए ...और 'वो 'अपने समूचे अस्तित्व और चेतना के साथ तिरोहित होता हुआ ! ! !
कला की दुनिया में क्यों ...