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एशियाड 82- 19 नवंबर, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम / विवेक शुक्ल

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रेत की तरह फिसल गया वक्त और चार दशक गुजर गए जब राजधानी में 19 नवंबर,1982 को नवें एशियाई खेलों का शुभाऱंभ हुआ था। क्या समां था उस दिन दिल्ली का। सब तरफ एशियाई खेलों के आयोजन का असर दिखाई दे रहा था। उस दिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने  एशियाई खेलों का जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में उदघाटन किया था। इस अवसर पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, एशियाई खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष बूटा सिंह, दिल्ली के उप राज्यपाल जगमोहन वगैरह भी वहां पर मौजूद थे। वह इंदिरा जी का जन्म दिन भी था। इसलिए उन्हें अलग से शुभकामनाएं भी मिल रही थीं। उन गौरवशली पलों के साक्षी बने थे स्टेडियम में बैठे एक लाख दर्शक, खिलाड़ी और आयोजन से जुड़े इंजीनियर, आर्किटेक्ट वगैरह लोग। इसके साथ ही देश के करोड़ों खेल प्रेमी अपने टीवी सेटों में एशियाई खेलों के उदघाटन समारोह को देख रहे थे। स्वतंत्र भारत में खेलों का वह सबसे भव्य आयोजन था। इससे पहले भारत ने 1951 में पहले एशियाई खेल आयोजित किए थे। पर वे 1982 के एशियाई खेलों की तुलना में बहुत छोटे थे। बेशक, दिल्ली के चौतरफा विकास के लिए  निर्णायक रहे थे 1982 के एशियाई खेल। तब यहां  अनेक स्टेडियम, फ्लाईओवर, खेल गांव, नई-नई सड़कें, बसों के रूट बने थे। दिल्ली पहली बार कायदे से विकास होता देख रही थी। तब यहां पर निर्माण कार्यों के लिए बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उड़ीसा से हजारों श्रमजीवी आए थे। वे फिर यहां पर ही बस गए थे। बेशक, उन खेलों के बाद दिल्ली का चेहरा कहीं अधिक समावेशी होकर उभरा था।


पीटी उषा,1982, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम


उड़न परी पीटी उषा को देश ने 1982 के एशियाई खेलों के दौरान ही पहली बार जाना था। हालांकि पीटी उषा ने 1980 के मास्को ओलंपिक खेलों में भाग लिया था। पर दिल्ली और देश ने उन्हें कायदे से पहली बार जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम में देखा था। पीटीउषा 100 मीटर की स्पर्धा में फाइनल में पहुंच कर एक तरह से बता दिया था कि वह अब लंबे समय तक ट्रैक पर राज करेंगी। 100 मीटर स्पर्धा के फाइनल को देखने के लिए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था। रेस के आरंभ होते ही पीटी उषा ने बढ़त बना ली थी। वह शेष प्रतियोगियों से आगे दौड़ रही थीं। पर फिर अचानक से वह पिछड़ने लगीं। रेस खत्म होने से पहले वह किसी तरह से दूसरे स्थान पर आ गईं और अंत में सिल्वर मेडल जीतने में सफल रहीं। उस स्पर्धा का गोल्ड फिलीपींस की लिडिया डि वेगा ने जीता था। उसके बाद पीटी उषा ने लिडिया डि वेगा को कई प्रतियोगिताओं में शिकस्त दी थी। पीटी उषा चालीस सालों के बाद फिर से उस दिल्ली में बतौर सांसद के लौटी हैं, जिधर उन्होंने अपने जीवन के पहले ही एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन किया था।


किसने किया था एशियाड 82 का विरोध


 राजधानी में एशियाई खेलों से पहले उसके आयोजन के समय को लेकर कुछ लेखक, रंगकर्मी, विद्यार्थी  नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से विरोध भी जता रहे थे। अंजली देशपांडे ने एशियाई खेलों के आयोजन में पैसे को पानी की तरह से बहाने के खिलाफ ‘सफेद अप्पू’ नाम से एक नाटक लिखा। उसका निर्देशन युवा रंगकर्मी हरि ने किया था। उसमें प्रमथेश अंबष्टा, शैलजा शिवसुब्रमणयम ( कैंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी), जोसेफ मथाई, अशोक प्रसाद ( कोलोरोडो यूनिवर्सिटी) अनिरुद्ध देशपांडे ( डीयू), एम.पी. सिंह, संजय बरनेला वगैरह ने भाग भी लिया था। अब इनमें से अधिकतर देश-विदेश के विश्व विद्लायों में पढ़ा रहे हैं। सफेद अप्पू के शो राजधानी के विभिन्न इलाकों के साथ-साथ फरीदाबाद में भी खेले गए थे। उन्हें दर्शकों ने खूब सराहा था। अंजली देशपांडे कहती हैं कि हम लोग खेल प्रेमी रहे हैं। हमारा विरोध तब इस बात को लेकर था कि एशियाई खेलों के आयोजन पर पैसा बहुत फूंका जा रहा था। हिंदी- अंग्रेजी, दोनों भाषाओँ में समान अधिकार से उपन्यास लिखने वाली अंजली देशपांडे कहती हैं कि हमारा सवाल देश की प्रथामिकता को लेकर था। हम सवाल पूछ रहे थेकि देश को बेहतर स्कूल और अस्पताल चाहिए न कि बड़े-बड़े स्टेडियम।


 


कितना उत्साह-उमंग था राजधानी में


 एशियाई खेल 19 नवंबर से लेकर 4  दिसम्बर 1982 तक हुए थे। राजधानी दिल्ली में युद्ध स्तर पर निर्माण कार्य चल रहे थे। आजादी के बाद देश पहली बार इतना बड़ा कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन कर रहा था। जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, कऱणी सिंह स्टेडियम, छत्रसाल स्टेडियम, इंद्रप्रस्थ स्टेडियम ( अब इंदिरा गांधी स्टेडियम) वगैरह का निर्माण एशियाई खेलों के लिए ही हो रहा था। कनॉट प्लेस, शंकर मार्केट, युसुफ जई मार्केट, खान मार्केट,लोदी रोड मार्केट आदि की सफेदी हो रही थी। मेरिडियन होटल, ललित होटल, मौर्या शेरटन तब ही बने थे। खेलगांव मार्ग पर खेल गांव को पूरा करने का काम दिन-रात चला था। 1982 में आयोजित एशियाई खेलों को एशियाड- 82 कहा गया था। इसके आयोजन के चलते पहले से बने हुए नेशनल स्टेडियम, शिवाजी स्टेडियम, तालकटोर स्टेडियम को विश्व स्तरीय बनाया गया था। सड़कों का चौड़ीकरण हुआ और नए-नए फ्लाईओवर भी बने। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का अजमेरी गेट की तरफ का गेट तब ही बनाया गया। इस कारण थामसन रोड में एक कब्रिस्तान और बहुत सारे सरकारी घरों को तोड़ा गया।


 क्या आपको याद है अप्पू


भारत सरकार ने एशियाड 82 के मद्देनजर 25 पैसे के दो नए सिक्के जारी किए थे। जिनमें से एक सिक्के के एक तरफ जंतर- मंतर और दूसरे सिक्के के एक तरफ अप्पू अंकित होता था। इन खेलों का शुभंकर अप्पू नामक एक शिशु हाथी था। वास्तविक जीवन में "कुट्टिनारायणन"नामक यह हाथी एक दुर्घटना में अपनी टाँग तुड़वा बैठा जब वह एक सैप्टिक टंकी में गिर गया और जिसके कारण अततः उसकी मृत्यु हो गई।उसी दौरान दिल्ली के प्रगति मैदान मे अप्पूघर का भी निर्माण हुआ था।


 एशियाड 82 के बहाने रंगीन टीवी की दस्तक


दिल्ली एशियाई खेलों का जब श्रीगणेश हुआ तो देश ने उसे रंगीन टीवी सेटों पर देखा। इससे पहले अक्तूबर के महीने से ही रंगीन टीवी की बुकिंग चालू हो गई थी। weston टीवी के ग्रेटर कैलाश के शो रूम में हर रोज दर्जनों लोग रंगीन टीवी की बुकिंग करवा रहे थे। तब रंगीन टीवी की कीमत 40 हजार रुपये से अधिक थी। जो आज के लिहाज से देखा जाए तो लाखों रुपये होगी। उस दौर में रंगीन टीवी खरीदना बड़ी उपलब्धि माना जाता था। तब लोगों के पास आज की तरह से पैसा तो नहीं था। सरकार ने टीवी बनाने वाली कंपनियों को रंगीन टीवी को बनाने के लिए जरूरी उपकऱणों के इम्पोर्ट की अनुमति दी थी। दूरदर्शन सिर्फ जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इंद्रप्रस्थ स्टेडियम(  अब इंदिरा गांधी स्टेडियम) तथा तालकटोरा स्वीमिंग पूल में हो रहे मैचों की ही रंगीन कवरेज कर रहा था। भारत-पाकिस्तान के बीच खेला गया हॉकी फाइनल मैच भी ब्लैक एंड व्हाइट ही दिखाया गया था।


 रिंग रेलवे का सफर


राजधानी में 1982 में एशियाई खेलों के आयोजन के दौरान सड़कों, स्टेडियमों और दूसरे इंफ्रास्ट्कचर के विकास तथा विस्ताUर के अलावा उत्तर रेलवे ने रिंग रेलवे को भी नये सिरे से शुरू किया था। इरादा यही था ताकि विभिन्न स्टेडियमों में आने-जाने वाले खेल प्रेमी और दूसरे लोग रिंग रेलवे की मदद से अपनी मंजिल पर आराम से पहुंच सकें। एक ट्रेन 80 मिनटों में 19 स्टेशनों का सफर तय कर लेती थी। इन स्टेशनों में मिन्टो ब्रिज, हजरत निजामउद्दीन, सदर बाजार, किशन गंज, दया बस्ती, सरदार पटेल मार्ग, चाणक्यपुरी, सेवा नगर, लाजपत नगर आदि स्टेशन शामिल थे। तब एक रुपये में सारे सफर की टिकट मिल जाती थी। बच्चों की टिकट मात्र 50 पैसे में मिल रही थी। महीने का पास 24 रुपये में और स्टुडेंस पास 12 रुपये में बन रहा था। रिंग रेलवे के तब के किराए की तुलना आज मेट्रो रेल के किराए से कीजिए। समझ आ जाएगा कि तब से लेकर अब तक कितनी बदल गई है दुनिया। हालांकि एशियाई खेलों के समय तो रिंग रेलवे में पर्याप्त संख्या में मुसाफिर सफर कर रहे थे, पर बाद में इसे फिर मुसाफिर मिलने बंद से हो गए थे।


1982 से डीटीसी का रूट नंबर 615


डीटीसी ने भी 1982 के एशियाई खेलों के मद्देनजर राजधानी में कई नए रूट शुरू किए थे। उनमें एक रूट नंबर 615 भी। रूट नंबर 615 का सफर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन (अजमेरी गेट) से पूर्वांचल हॉस्टल के बीच शुरू हुआ। डीटीसी ने इन 40 सालों के दौरान अपने अनेक रूट बंद किए और नए चालू किए, पर 615 बदस्तूर जारी है। हां, कुछ साल पहले इसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की बजाय मिन्टो रोड टर्मिनल से शुरू किया जाने लगा। जब रूट नंबर 615 शुरू हुई तब  किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस रूट से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में पढ़ने-पढ़ाने वालों का एक भावनात्मक रिश्ता बन जाएगा। उनकी इससे तमाम यादें जो जुड़ी हैं। जेएनयू की कई पीढ़ियों ने इसमें सफर किया है। जेएनयू से बाहर निकलने से लेकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन समेत बहुत सी जगहों में जाने के लिए रूट नंबर 615 एकमात्र सहारा रही है। यह बस सुपर बाजार, सिंधिया रोड, ईस्टर्न कोर्ट, नेशनल म्यूजियम, सफदरजंग रोड,लक्ष्मी बाई नगर,सरोजिनी नगर,आर.के.पुरम, मुनीरका गांव, वसंत विहार वगैरह होते हुए गोदावरी हॉस्टल और पूर्वांचल हॉस्टल पर पहुंचती है। और 20 मिनट के बाद 615 फिर से निकल पड़ती है अपनी मंजिल पर। ये करीब-करीब नामुमकिन है कि इसके  सफर में जेएनयू के कुछ या काफी छात्र न बैठे हो।


प्रकाश पदुकोण क्यों आए थे मॉडर्न स्कूल में


प्रकाश पादुकोण 1982 के एशियाई खेलों में भारत की तरफ से खेल नहीं रहे थे। उसके कुछ तकनीकी कारण थे। पर वे तब तक आल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियन बन चुके थे। सारी दुनिया उन्हें उच्च कोटि के बैडमिंटन स्टार के रूप में पहचान रही थी। वे भी अपनी हर जगह गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाते थे। वे विवादों से परे रहते थे। एशियाई खेलों के विधिवत उदघाटन से पहले बैडमिंटन मुकाबलों में भाग लेने वाले देशों के खिलाड़ी मॉडर्न स्कूल बाराखंभा रोड के बैडमिंटन हॉल में प्रेक्टिस कर रहे थे। उन्हें वहां पर तमाम बैडमिंटन प्रेमी देख रहे थे। सारा माहौल बेहद खुशनुमा था। तब वक्त रहा होगा दिन के करीब तीन बजे का। तब ही प्रकाश पादुकोण भारतीय टीम के कुछ खिलाड़ियों के साथ हॉल में प्रवेश करते हैं। उनके आते ही सारा हॉल तालियों से गूंजने लगता है। यह खाकसार भी वहां पर था। सभी देशों के खिलाड़ी और उनके कोच प्रकाश पादुकोण की तरफ बढ़ते हैं। सबको प्रकाश पादुकोण का आटोग्राफ चाहिए था। तब तक सेल्फी का दौर आने में लंबा वक्त  शेष था। प्रकाश पादुकोण ने दस-बीस आटोग्राफ दिए। उसके बाद हाथ जोड़ लिए। फिर वे भारतीय टीम के साथ अभ्यास करने लगे।


 विवेक शुक्ला, नवभारत टाइम्स, 19 नवंबर, 2022



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