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माटी की गंध से लबरेज रिपोर्टिंग की यादें / त्रिलोकदीप

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दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय ने मुझे एक के बाद एक ऐसे असाइनमेंट दिये जो लंबी दूरी के हुआ करते थे और उनकी बदौलत पूरे राज्य का कमोबेश दर्शन हो जाया करता था। निकलते तो थे हम एक स्टोरी के लिए, मिल जाती थीं तीन चार स्टोरियां।मसलन गया तो मैं लद्दाख कवर करने के लिए  था, मुझे जम्मू कश्मीर के बहुत से संवाद मिल गये। इसी प्रकार बिहार के लिए मुझे भूदान के बारे में  संवाद तैयार करने थे, लिख मैंने कई इतर संवाद भी दिये जो खासे सराहे  गये। पटना में मेरे साथ थे जुगनू शारदेय, जो उस समय दिनमान के लिए लिखा करते थे। उन्होंने  मेरी मुलाकात रेणु जी से करायी। रेणु जी ने  मुझे सलाह दी कि मैं सहरसा और पूर्णिया में बिहारी सिखों से मिलूं और हो सके तो बिराटनगर का एक चक्कर भी लगा आऊं। बहुत बढ़िया सुझाव था। भूदान आंदोलन से जुड़े दो युवक सुधेन्दु पटेल और कुमार प्रशांत भी मिले जिन्होंने भूमि वितरण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। अब मुझे राजस्थान में खादी ग्रामोद्योग के विस्तृत दौरे का दायित्व मिला। कार से ही आना जाना था। कमोबेश सारे राजस्थान का ही दौरा था। कई समाचार पत्रों के औऱ पत्रकार भी साथ में थे। मैं खुशकिस्मत था कि मुझे साथ मिला हिंदुस्तान टाइम्स के राज गिल का। उन्हें मैं पढ़ता रहा हूं और उनकी विद्वता से भी थोड़ा बहुत परिचित था।

दिल्ली से हम सभी पत्रकार साथ साथ निकले। हर कार में पत्रकारों के साथ खादी ग्रामोद्योग का एक अधिकारी भी था। वह रास्ते भर हमें ब्रीफ करता रहा। जयपुर में हमारा पहला पड़ाव था। वहां पर एक मंत्री टाइप के व्यक्ति ने अंग्रेज़ी में संबोधित करने का प्रयास किया। राज गिल समझ गये कि अंग्रेज़ी बोलने में इन्हें दिक्कत हो रही है।  उन्हें सहज करते हुए गिल जी ने कहा , आप हिंदी में बोलिये हम सब समझ जायेंगे। उन्होंने खादी के अनुसंधान, निर्माण, विकास और मार्केटिंग की विस्तृत जानकारी दी। अगले दिन सुबह हमें कोई ऐसे स्थान दिखाने थे जहां से कच्चा माल प्राप्त करके उसे  फिनिश करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी देनी थी। इस पहले प्रोग्राम के बाद हमें जयपुर घूमना था। उनकी तरफ से भी प्रबंध था और हमें अपनी मनमर्जी की भी छूट थी। जयपुर में समाचार एजेंसी के सतीश जुगरान से भी मुलाकात हो गयी। वह भी हमारे साथ हो लिये। राज गिल ने नेशनल हेराल्ड के मुसद्दीलाल रस्तोगी को फोन लगाकर लोकल द्रव्य का इंतज़ाम करने को कहा। वह भी हमें मिलने के लिए आ गया। वह जो सामान लाया था उसे हमने रास्ते के लिए रख लिया। मुसद्दीलाल के साथ जयपुर में  रसपान किया और डिनर भी। अगले दिन सुबह तैयार होकर जब हम लोग कच्चा माल देखने के लिए पहुंचे तो हमें रूई के ढेर दिखाए गए जिनसे खादी तैयार होती है। बातचीत चली। दूसरे साथियों से मुलाकात हुई और हम अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े। जोधपुर में लंच लिया। तय हुआ कि बालोतरा और बाड़मेर के बीच रेगिस्तान के बीच रात गुजारी जाएगा। मैं और राज गिल रेत के एक टीले के पास जाकर जम गये। चांद की चांदनी खूब सुकून प्रदान कर रही थी। हम दोनों द्रव्य पान कर रहे थे और चांद के रेत पर पड़ने वाले प्रतिबिंब को निहार रहे थे। मुझे लगा राज गिल अपनी सृजन की दुनिया में खो गया है। मैं जानता था कि वह बहुत पायेदार लेखक है और उनका अंग्रेज़ी और पंजाबी पर समान अधिकार है। थोड़ी देर में बोले, देखो दीप यह चांद का रिफ्लेक्शन। यार आंधी आने पर ये रेतीले टीले कहाँ गायब हो जाते होंगे। खो जाने पर यहां के लोग एक दूसरे को कैसे तलाशते होंगे। उनके दिमाग में कई तरह के प्लाट घूमने लगे थे। इतने में खाने का पैगाम आ गया। भोजन के बाद विश्राम किया और सुबह उठकर बाड़मेर। वहां खादी ग्रामोद्योग का काम देखने के बाद गदरा रोड का रेलवे स्टेशन देखा जो 1965 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान हमारे कब्जे में आ गया था। बाड़मेर में एक पाकिस्तानी टैंक भी था जो निशानी और अपने शूरवीरों के शौर्य के प्रतीक के तौर पर वहां रखा गया था। वहां से हम लोग  जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर आदि से होते हुए दिल्ली लौटे थे। खादी के अलावा मेरे पास राजस्थान के जनजीवन, कला, हवेलियों के निर्माण और उसकी कला, राजस्थान के स्मारकों का महत्व और पयर्टन जैसे तमाम विषय थे जिन पर मैंने आलेख तैयार किये थे।

इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि राज गिल थी। क्या ज़हीन और प्यारा इंसान। धीमे धीमे बोलने वाला, ठेठ पंजाबी बंदा। अपनी माँ बोली से बहुत प्यार। उनकी लेखनी में एक अजब तरह की लय होती है जो एक अलग तरह का एहसास कराती है। उनकी रिपोर्टिंग कभी भी आपको शुष्क नहीं लगेगी। चाहे वह डिफेंस पर लिखें, कृषि पर या अन्य किसी विषय पर उनकी बौद्धिक और साहित्यिक छाप दीख ही जाएगी। एक बार उनसे मिलने के लिए उनके आफिस में गया तो उन्होंने मेरी मुलाकात प्रभा बहल से कराते हुए कहा था कि यह हमारे दफ्तर की शेरनी है, मजाल है कोई इससे पंगा ले। उसने जवाब में कहा था कि गिल साहब हमारे मार्गदर्शक हैं, इनकी रिपोर्टें पढ़ने में मज़ा आता है।हम लोगों के आदरणीय हैं। बाद में वह प्रभा दत्त हो गईं। उनकी शादी एस .पी. दत्त से हुई । वह एयर इंडिया में थे और मेरे मित्र। अक्सर दिनमान में मुझसे मिलने आया करते थे । एक बार मैं एयर इंडिया पर कोई स्टोरी कर था तब भी वह आये थे। आज भी वह मेहरबान हैं।

राज गिल के साथ मुलाकातों का दौर जारी रहा।कभी मैं उनके घर कीर्तिनगर चला जाता या वह कभी हमारे तब के घर सुदर्शन पार्क आ जाते। हम लोगों के बीच लिखने पढ़ने पर ही चर्चाएं हुआ करती थीं। कभी कभी सामाजिक मुद्दों और मसलों पर भी बातचीत हो जाती। एक बार उन्हें कुछ समय के लिए हिंदुस्तान टाइम्स के ईवनिंग न्यूज़ की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई । उन्हें लगता था कि यहां बैठ कर उनकी सृजनात्मक सोच कुंद हो रही है। मन की तस्सली के लिए वह मुख्य पत्र में लिख ज़रूर लेते थे लेकिन इवनिंग न्यूज़ में वह असहज महसूस किया करते थे। आजभी उनकी धीर गंभीर और मौलिक सोच और ईमानदाराना सलाह की बहुत याद आती है।उनकी सुनहरी यादों को नमन।




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