जनता का धन
भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने सरदार पटेल के निधन के बाद केंद्र में गृह मंत्री का पद संभाला। गांधीजी के भक्त पंतजी जनता के धन की फिजूलखची के सख्त खिलाफ थे। वो चाहते थे कि एक एक पैसे की हिफाजत हो। उनके सरकारी निवास की कालीन एक दिन थोड़ी जल गयी तो अफसरों ने उसे बदलने के लिए सैंपल मंगा लिया। पंतजी तक बात पहुंची और उन्होंने देखा कि जो कालीन आ रहा है वो काफी महंगा है। नया कालीन मंगाने से मना कर दिया और कहा कि यह जनता के धन की फिजूलखर्ची है। जिस हिस्से में कालीन जल गयी है उसके ऊपर सोफा रख दो। शोभा भी बनी रहेगी और जनता का धन भी बेकार नही जाएगा। ..यह महज एक घटना नहीं। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी उनकी किफायत के एक से एक सैकड़ों किस्से हैं। लेकिन यह बात उन लोगों के समझ से परे है जो सरकारी जहाजों से चप्पल मंगवाते हैं या पूजा पाठ करने काफिले के साथ चले जाते हैं। जनता के धन को पानी की तरह बहाने में कोई संकोच नहीं करते। बस दिमाग में आया तो यह कहानी लिख दी क्योंकि पंतजी हमारे इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उपज थे। उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रशासन की जो आधारशिला उन्होंने रखी थी उसी पर यह प्रदेश इतनी विशाल आबादी के बाद भी संभला रहा। इस पोस्ट के साथ एक फोटो भी शेयर कर रहा हूं जिसमें वे राज्यों के नेताओं के साथ गृह मंत्रालय में एक बैठक कर रहे हैं। यह तस्वीर भी बहुत कुछ बताती है। आजादी के बाद की उस पीढ़ी के नायक कैसे थे..