व्यंग्यकारों की नजर में व्यंग्य
प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारुहार
भाई किसानों को खालिस्तानी कहने पर इतना क्या बुरा मानना !!!! अरे यह तो उनकी पहचान है। अपनी पहचान से भी भला कोई चिढ़ता है।
अच्छा भाई यह बताओ कि किसानों की जेब खाली है कि नहीं.......
समर्थक- हाँ जी बिलकुल खाली। छदाम भी नहीं!
चलो छोड़ो, अच्छा यह बताओ कि इस व्यस्तता के दौर में भी सबसे ज्यादा खाली किसान है कि नहीं........ हैं न!!!
समर्थक- हाँ साहब ये तो बिलकुल सत्तारी है। साल भर ऊँघते रहते हैं। ठीक से अनाज तक नहीं पैदा करते। हमें हर साल पड़ोसी देशों से लेना पड़ता है।
ख़ैर चलो इसे भी छोड़ो, आप यह बताइये कि ये (किसान) खाली टाइम में आंदोलन करते हैं कि नहीं ... करते हैं न !!
समर्थक- हाँ साहब करते हैं। ये तो पैदा ही इसीलिए हुए हैं।
*तो फ़िर जो इत्ते खाली-खाली हैं वे खालिस्तानी हुए कि नहीं।*
समर्थक- जय हो साहब की l
/- संजीव शुक्ल
: रूबरू में आपके सवाल__
व्यंग्य लेखन गंभीर कर्म है, व्यंग्य शाला समूह सीखने सिखाने की पाठशाला है। व्यंग्य शाला में कल गुरुवार को सुबह 10 बजे से रात्रि आठ बजे तक 'रूबरू'कार्यक्रम में इस बार आपके सवालों के जवाब लखनऊ के वरिष्ठ व्यंंग्यकार श्री राजेन्द्र वर्मा जी देंगे। आप सबसे निवेदन है कि व्यंग्य विधा से संबंधित सवाल हमारे वाट्स अप नंबर 9977318765 पर आज रात्रि तक अवश्य भेज दें।
* जय प्रकाश पाण्डेय
व्यंग्य क्या है, देखिए त्यागी जी की एक झलक -
(( त्यागीजी के व्यंग्य की एक झलकी-))
जहां तक लड़कों का प्रश्न है, मेरी सलाह है कि वे कुछ रचनात्मक कार्य करें। रेल की पटरी उखाड़ना, सरकारी बसें जलाना, डाकखाने लूटना, पुलिस के साथ हाथापाई करना यह सभी कुछ रचनात्मक कार्यों की परिधि में ही आता है। बड़ी बात यह हे कि इन क्षेत्रों में अभी इतना काम होने को पड़ा है कि आपके बेकार रहने का प्रश्न ही नहीं उठता। रेल की पटरी हमारे देश में इतनी लंबी है कि आपकी पूरी पीढी भी शायद उवे पूरी तरह न उखाड़ सके। खाली बैठने से काम करना कहीं बेहतर है...इस संदर्भ में मैं आपको यह भी बताना उचित समझूंगा कि ऊपर बताए गए कार्यों को सम्पन्न करने के लिए आप सरकार का मुंह कभी न ताकिए...ये शुभ कार्य आपको निस्वार्थ भाव स्वतः ही करने हैं। सरकार कोई गलती करे न करे, आपको रेल की पटरी उसी भांति उखाड़नी है जिस प्रकार तुलसी दास ने.....
((रवीन्द्रनाथ त्यागीजी के ‘एक दीक्षांत भाषण’ व्यंग्य का अंश))
लेखक तीन प्रकार के होते हैं-
1. एक जो कुतुबमीनार पर चढ़कर आप पर थूकते हैं, ये सयाने होते हैं ।
2. जो कुतुबमीनार पर थूकते हैं । ये महासयाने होते हैं ।
( उपरोक्त दोनों लोकप्रियता के पितामह होते हैं )
3. जो आपको साथ लेकर कुतुबमीनार चढ़ते हैं, ये मूर्ख किस्म के लेखक होते हैं, लेखक समाज पर कलंक होते हैं, अल्पमत में होते हैं अत: कलंक ही होते हैं, मृत्यूपरांत यह एक नयी कुतुबमीनार बन जाते हैं, थूकने-थुकवाने के लिए ।l l
l जयहिन्दl
आदरणीय साथियो
आज आप सबके विचार करने , पढ़कर सीखने और व्यंग्य के विषय को आत्मसात करने की कला से परिचित कराने के उद्देश्य से आदरणीय सुरेश कांत जी की एक व्यंग्य रचना रख रहा हूँ।
ब से बैंक वाले सुरेश जी का परिचय देते हुए इतना ही कहूंगा कि बस
नाम ही काफी है
वे ऐसे लेखक हैं जिनके पास एक स्वस्थ और सुचिंतित व्यंग्यदृष्टि है , उन्हें विसंगतियों की पहचान तो है ही , पर वे उन जगहों को भी देख पाते हैं जहां विसंगतियों के कारखाने चल रहे हैं और फिर वे इन जगहों के अवैध अतिक्रमण हटाये जाने की मुहिम चलाते हैं ।
उनकी व्यंग्य भाषा से तो किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है ।
उनका व्यंग्य पटल पर प्रस्तुत करते हुए मैं खुद को गौरवान्वित समझ रहा हूँl l
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